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Saturday, 07 April 2018 16:21

योगी सरकार स्कूलों पर लगाम लगा पायेगी?

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रविश अहमद 

गत वर्ष मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अभिभावकों एवं शिक्षकों का हित ध्यान में रखते हुए एक निर्देश जारी किया था जिसके क्रम में जिला विद्यालय निरीक्षक द्वारा दिनांक 01-04-2017 को सभी प्राइवेट स्कूल संचालकों को आदेश जारी किये जिसमें लगभग क्रमवार वही सभी बिन्दु थे जो हाल के योगी सरकार कैबिनेट निर्णय में हैं लेकिन किसी एक भी संस्थान द्वारा न तो इन निर्देशों का पालन किया गया न ही किसी अधिकारी द्वारा इस आदेश पर कोई मॉनिटरिंग या कोशिश ही की गयी। यहां तक कि शिक्षा विभाग सहारनपुर के एक सक्षम अधिकारी ने तो गत वर्ष के आदेश के सम्बन्ध में यहां तक कहा कि ये स्कूल हमारे अंडर नही आते हैं और निर्देश तो ऐसे ही आते हैं ऐसे ही हम आगे भेज देते हैं। उन्होने यहां तक कहा कि उन्हें इस सम्बन्ध में न्यायालय द्वारा भी चेतावनी दी गयी जिसमें माननीय न्यायालय ने कहा कि आपसे अपने स्कूल तो संभलते नही इनको क्यों छेड़ते हो? इसी तरह एक स्कूल की प्रिसंपल ने भी पूर्व में जिला विद्यालय निरीक्षक के द्वारा जारी आदेशों को मानने से इनकार करते हुए जबरन रिएडमिशन फीस वसूली, ऐसा कहीं एकाध जगह नही बल्कि हर स्कूल में गत वर्ष हो चुका है। बड़ी अजीब सी व्यवस्था है जब जनता का सबसे बड़ा प्रतिनिधि कहता है कि स्कूलों पर लगाम लगाओ और इसी जनता से वसूले गये राजस्व से तन्ख़्वाह पाने वाले पब्लिक सर्वेन्ट कहते हैं कि वह ऐसे ही निर्देश आगे जारी करते हैं ऐसे ही मतलब कुछ नही होगा। ख़ैर पहले का फरमान अकेले मुख्यमंत्री का था तो इस बार पूरी कैबिनेट का मतलब सब चाहते हैं कि प्राइवेट संस्थानों पर लगाम लगे और अभिभावकों का शोषण बन्द हो लेकिन सवाल अभी भी जस का तस है क्या व्यवस्था को चलाने वाले इस आदेश का अनुपालन करा पायेगें? मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने काफी घोषणाएं जनहित में की हैं जिनमें प्रत्येक व्यक्ति को राहत पंहुचाने की कोशिशें हैं तो स्कूलों से सम्बन्धित आदेश में अभिभावकों एवं शिक्षकों के सम्बन्ध में भी उनका निर्णय सराहनीय था। इसी तरह एक बड़ा आदेश अवैध बूचड़खानों को बन्द करने तथा मीट की दुकानों को व्यवस्थित करने का भी रहा। इस आदेश का अनुपालन किस जगह हुआ यह अभी तक ज्ञात नही है, हर जगह जो मीट की दुकानें खुली हैं क्या वें अब लाईसेंस प्राप्त हैं, क्या वो नियामक जो एक दुकान के लिये बनाये गये थे पूरे किये जा रहे हैं? लेकिन अगर आरटीआई के माध्यम से कोई सवाल पूछ ले तो शायद उसे 5-7 महीनों में जवाब मिल जाये आख़िर काग़ज़ी कार्यवाही तो की ही गयी होगी।

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