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Wednesday, 29 April 2020 16:27

हर चरित्र को अपना बना लेते थे इरफान

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बॉलीवुड सितारों और सुपरस्टार से भरा हुआ है। 100 करोड़ रुपए और पॉवर जो प्रतिभा के साथ या बिना प्रतिभा के बॉक्स ऑफिस पर दहाड़ता है। फिर भी अभिनेताओं का एक छोटा-सा वर्ग है जो अपनी कला के लिए अकल्पनीय जुनून के साथ बाहर खड़ा रहता है। 53 साल के इरफान खान, जिनका 29 अप्रैल को एक लंबी बीमारी के बाद मुंबई में निधन हो गया, वो कलाकारों की उस दुर्लभ जमात में से थे, जिन्होंने हिंदी फिल्मों में सम्मानजनक प्रदर्शन किया।

भारतीय और अंतरराष्ट्रीय सिनेमाघरों की व्याकुलता से उलट दुनिया को एक ऐसा कलाकार मिला जिसने अपनी हर चीज को वास्तविक रूप से दिखाने के लिए अपनी क्षमता से सभी पक्षों को बदल दिया। उनके निधन से विश्व सिनेमा और बॉलीवुड ही नहीं, सबने किसी ऐसे व्यक्ति को खो दिया है जो वास्तव में जन्मजात अभिनेताओं की जमात से संबंधित था। उन्होंने जो कुछ भी किया, उसमें अपना सर्वश्रेष्ठ दिया। कभी भी हॉलीवुड के एक असाधारण अभिनेता और कम बजट वाले कमर्शियल आर्ट्स के बीच भेदभाव किए बिना उन्होंने फिल्म में अभिनय के बाद फिल्मों के उन दृश्यों को हमेशा के लिए चुरा लिया चाहे उनकी भूमिका उस फिल्म में कितनी भी छोटी क्यों न हो। 

यदि बॉलीवुड को नए दशक की शुरुआत में एक अलग तरह के किरदार की जरूरत थी तो नए-पुराने दर्शकों के साथ वर्षों पुरानी फिल्मों में प्रदर्शन के फॉर्मूला के साथ यह इरफान में मिला। उन्हाेने हासिल (2003), मकबूल (2003), लाइफ इन ए मेट्रो (2007), पान सिंह तोमर (2012), साहेब, बीवी और गैंगस्टर (2013), लंचबॉक्स (2013), हैदर (2014), पीकू (2015) जैसी फिल्मों के अलावा तलवार (2015), हिंदी मीडियम (2017) और अंग्रेजी मीडियम (2020) में अभिनय किया। उन्होंने मनोज वाजपेयी और नवाजुद्दीन सिद्दीकी के साथ हाई-कैलिबर, "एवरीमैन" अभिनेताओं के समानांतर पावर सेंटर बनाने में मदद की। इरफान ने विशाल भारद्वाज, राम गोपाल वर्मा और अनुराग कश्यप से लेकर हंसल मेहता और तिग्मांशु धूलिया सरीखे नई पीढ़ी के निर्देशकाें / निर्माताओं के साथ मिलकर काम किया, जिन्होंने फिल्म निर्माण की संवेदनशीलता के साथ भारतीय सिनेमा को जीवन के एक नए पायदान पर पहुँचाया।

इरफान ने अपने साथियों से अलग होने का जो तरीका तय किया था उसने अंतरराष्ट्रीय सिनेमा, विशेष रूप से हॉलीवुड पर प्रभाव डाला। जिसे कुछ एशियाई अभिनेताओं ने ही पाया था। भले ही उन्होंने मीरा नायर की विश्व स्तर पर सराही गई फिल्म सलाम बॉम्बे(1988) में एक छोटी भूमिका से करिअर की शुरुआत की थी! इरफान ने द वारियर (2001), द नेमसेक (2007), ए माइटी हार्ट (2007), स्लमडॉग मिलियनेयर (2008), लाइफ ऑफ पाई (2012) काे अपने अभिनय से सार्थक किया। जब तक उन्हें हॉलीवुड की दिग्गज फिल्में, द अमेजिंग स्पाइडर-मैन (2012) और जुरासिक वर्ल्ड (2015) मिली तब तक वो एक क्रॉसओवर एशियाई अभिनेता से कही अधिकबन चुके थे। उस समय तक वो अपने आप काे अंतरराष्ट्रीय पटल पर स्थापित कर चुके थे। वो गिने चुने स्टार्स में से थे, जिन्होंने अमेरिकी फिल्म उद्योग में अपनी किस्मत आजमाई।

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