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Tuesday, 26 May 2020 16:34

लेनिन से सीखने की जरूरत है न कि खारिज करने की

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एस आर दारापुरी

इंडियन एक्सप्रेस में इधर किसी लेख के जवाब में लेखक, अध्यापक और सामाजिक कार्यकर्ता अपूर्वानंद की टिप्पणी पर नजर पड़ी. पहले तो मुझे लगा कि शायद लेखक कह रहे हैं कि लेनिन के क्रांति के मॉडल को भारत में दोहराने की जरूरत नहीं है। लेकिन जब पूरा लेख पढ़ा तो मुझे आश्चर्य और बेहद निराशा हुई। लेखक महोदय ने न केवल लेनिन और रूस की अक्टूबर क्रांति को खारिज किया है बल्कि यहां तक कह दिया है कि लेनिन ने जो व्यवहार रूस में अपनी जनता के साथ किया था. वैसा ही व्यवहार पिछले 6 वर्षों से भारत में देश की जनता के साथ किया जा रहा है। यानी मोदी सरकार से भी बदतर सोवियत सरकार रही है। हममें से कुछ उदारवादियों की यह समस्या है कि वह राज्य और सरकार के वर्ग चरित्र से पूरी तौर पर आंख बंद कर लेते हैं।

भला कोई आदमी सोवियत यूनियन के राज्य का और यहां (भारत) के सामंती पूंजीवादी राज्य की तुलना कैसे कर सकता है।

कहां सोवियत सरकार मजदूर, किसान, शोषित-उत्पीड़ित जनता के राज्य का प्रतिनिधित्व करती है और कहां यहां की सरकार जो कि घोर सामंती, कारपोरेट, पूंजीपतियों की ब्राह्मणवादी सरकार है।

हमने भारतवर्ष में अधिकांश उदारवादी राजनेताओं का यहां तक कि गांधीजी, लोहिया व जयप्रकाश की रचनाओं का भी अध्ययन किया है। कहीं भी हमने अक्टूबर क्रांति को और लेनिन को इस तरह से खारिज करते हुए नहीं देखा है। कोई ऐसा कर भी कैसे सकता है। मानव इतिहास में जो भूमिका अक्टूबर क्रांति की है, उसने दुनिया की सभ्यता को मानवता को एक नया युग दिया, एक नई सभ्यता और संस्कृति दी। लेखकों को और बुद्धिजीवियों को दर्शन और अवधारणा के क्षेत्र में तर्क और खंडन करने का पूरा अधिकार है। लेकिन राजनीति वास्तविकताओं और संभावनाओं के ही दायरे में काम करती है। 1789 की स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व की फ्रांस की महान क्रांति की जमींन पर तानाशाह सम्राट नेपोलियन ने कब्ज़ा कर क्रांति के मूल्यों को खत्म कर दिया था. यूरोप में 1848 की क्रांति विफल हो गई थी, पेरिस कम्यून की क्रांति को रौंद दिया गया था। समाजवादी क्रांतिकारियों और मेंसेविकों के लोकतंत्र का रूसी प्रयोग न केवल बेहद निम्न कोटि का था बल्कि विफल होने के लिए अभिशप्त था। इसी पृष्ठभूमि में लेनिन ने यूरोप की विफल क्रांतियों से सीख लेते हुए परिवर्तन की राजनीति का जो यथार्थ बनाया, जो अक्टूबर क्रांति की, उसने दुनिया के इतिहास के चित्र को ही बदल दिया।

यह अक्टूबर क्रांति ही थी जिसने हमारे जैसे ढेर सारे गुलाम मुल्क के लोगों में आजादी की लड़ाई को नई रोशनी दी, हमारे संघर्ष को स्वतंत्रता तक पहुंचाया। यह लेनिन की राजनीति की विरासत ही थी, जिसने हिटलर और मुसोलिनी के नाज़ीवाद और फासीवाद को शिकस्त देकर उदारता और मानवता की रक्षा की। अगर उस समय फासीवाद को परास्त करने की यह ऐतिहासिक जिम्मेदारी सोवियत यूनियन ने न ली होती तो आज हम उदारवादियों की क्या स्थिति होती, यह कहना मेरे लिए मुश्किल है।

माना कि लेनिन से भी गलतियां हुई होगी। लेकिन उन परिस्थितियों पर भी गौर करने की जरूरत है जहां वह चारों तरफ मानवता विरोधी ताकतों से घिरे हुए थे। यह जरुर है कि लेनिन ने 1918 से 1921 तक वार कम्यूनिज्म का दौर चलाया, जिसमें कुछ ज्यादतियां भी हुई, लेकिन उन्हीं लेनिन ने सोवियत यूनियन के लिए एक नई अर्थव्यवस्था का भी प्रयोग किया। मार्क्स की वह महान अवधारणा जिसमें कोई राज्य नहीं होगा, जिसमें मनुष्य खुद ही अपनी नियति का कर्ता होगा, जीवन संपूर्णता में जियेगा, उसका पहला सफल राजनीतिक प्रयोग लेनिन ने ही किया. लेनिन का यह प्रयोग मानवता में यह विश्वास पैदा करता है कि एक राज्यविहीन समाज का भी निर्माण आने वाली पीढ़ियां जरूर करेंगी, जिसमें मनुष्य की मर्यादा और सत्ता सर्वोपरि होगी।

लेनिन जानते थे कि बगैर वर्ग के विनाश के मनुष्यता की, मानवता की रक्षा नहीं की जा सकती। जिस विविधता, बहुलता के नागरिक समाज को आज हम दुनिया में देखते हैं, उसकी भी नीव लेनिन ने ही रखी थी। यही नहीं नर-नारी समानता का उद्घोष लेनिन से ही हुआ था। इसलिए दुनिया भर के नारी आंदोलन आज भी लेनिन को अपना पथ प्रदर्शक मानते हैं। भारतवर्ष में डॉक्टर अंबेडकर ने भी यह महसूस किया कि यहां जातियां ही हैं जो वर्ग का प्रतिनिधित्व करती हैं और बिना जाति विनाश के नागरिक समाज का निर्माण नहीं हो सकता. स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व के विचार को फलीभूत नहीं किया जा सकता। वर्ग विहीन समाज में ही जाति विनाश और जाति विहीन समाज से ही वर्ग विहीन समाज का निर्माण होता है। वर्ग और जाति के विरुद्ध संघर्ष एक संपूर्ण इकाई है उसे एक दूसरे के विरुद्ध नहीं खड़ा किया जा सकता है। बुद्ध ने भी ब्राह्मणवाद से, जातिवाद से मुक्ति के लिए ही इस लोक और व्यक्ति के ज्ञान पर जोर दिया और कहा कि अप्प दीपो भव:। यह महान दर्शन भी भारत में ब्राह्मणवाद से पराजित हुआ, लेकिन मानव जाति की सेवा में इसकी भूमिका समाप्त नहीं हुई है।

इसलिए इस दौर में जहां फासीवाद अपने वीभत्स रूप में भारतीय राज्य, समाज और जीवन को निगलने में लगा हुआ है, लेनिन से सीखने की जरूरत है, खारिज करने की नहीं। नवउदारवाद निकृष्ट और निर्मम उत्पादन प्रणाली है, जो हमारे देश में फासीवाद का कारण बनी हुई है। उससे निपटने में उदार विचार और पूंजीवादी व्यवस्था सक्षम नहीं दिख रहे हैं। इसलिए नई समतामूलक आर्थिक, राजनीतिक व सामाजिक व्यवस्था के निर्माण के लिए मार्क्स और लेनिन से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। जैसे हम डाक्टर अंबेडकर, गांधी, लोहिया, जय प्रकाश के प्रयोग से सीख सकते हैं। स्वयं गांधी जी ने भी बहुत सारी गलतियां की थीं, लेकिन आज हम उन्हें फासीवाद के विरुद्ध लड़ाई में खारिज तो नहीं कर सकते हैं।

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