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Tuesday, 11 September 2012 14:10

यूपी में सिगरेट पर भारी वैट से स्मगलिंग में इज़ाफा Featured

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उत्तर प्रदेश, 11 सितम्बर: उ.प्र. सरकार द्वारा जुलाई, 2012 से सिगरेटों पर लगने वाला मूल्य संवर्धन कर (वैट) 17.5 प्रतिशत से 50 प्रतिशत करने पर पूरे राज्य में हंगामा मचा है। वैट में वृद्धि से सिगरेटों की अंतर्राज्यीय स्मगलिंग में भारी वृद्धि हुई है।

दिल्ली, उत्तराखंड , हरियाणा, मध्यप्रदेश, बिहार, झारखंड और छत्तीगढ़ में वैट की औसत दर 20 प्रतिशत है। अंतर्राज्यीय स्मगलरों को इससे बढ़ावा मिला है क्योंकि वे राज्य के अधिकरणों को धोखा दे कर सिगरेटें यहां पहुंचा रहे हैं और भारती लाभ काम रहे हैं।

उ.प्र. के व्यापारी संगठन राज्य सरकार का ध्यान अनियंत्रित अंतर्राज्यीय स्मगलिंग की तरफ खींच रहे हैं और वैट वृद्धि निर्णय की समीक्षा करने की मांग कर रहे हैं, जिसके कारण अंतर्राज्यीय स्मगलरों को अधिक ताकत मिल रही है जो एक वैध व्यवसाय गतिविध का माहौल खराब कर रहे हैं।

उत्तर प्रदेश, उत्तर भारत में सिगरेटों के अवैध निर्माण का मुख्य केंद्र बन चुका है। अनुमान है कि सिगरेट बाज़ार के लगभग 25 प्रतिशत बाज़ार पर इन अवैध निर्माताओं का कब्जा है। उनके व्यवसाय के बढ़ने के कारण राज्य सरकार को और अधिक नुकसान हो रहा है। उद्योग के जानकारों के अनुसार, अवैध निर्माण के कारण राजस्व मे होने वाली यह हानि सैंकड़ों करोड़ तक हो रही है। अवैध निर्माण के कारण सरकारी खजाने को होने वाली यह राजस्व हानि वैट बढ़ाने से पूरी होने वाली नहीं है।

नवीनतम यूरोमॉनीटर आंकड़ों के अनुसार, भारत में सिगरेटों का अवैध व्यापार लगातार बढ़ रहा है। 2006 में, यह बताया गया कि सिगरेट की बिक्री की कुल मात्रा का 11.8 प्रतिशत अवैध था।

2009 तक, यह 15.4 प्रतिषत तक बढ़ गया और 2011 में यह 16.5 प्रतिषत की ऊंचाई तक पहुंच चुका है।

यूरोमॉनीटर का अनुमान है कि 2016 तक भारत में सिगरेट रिटेल का अवैध व्यापार लगभग 23 प्रतिशत तक पहुंच जाएगा। 

उ.प्र. में परेशानी की स्थितिः उत्तर प्रदेश राज्य के सभी क्षेत्रों से बर्बादी की कहानियां सामने आ रही हैं। गंभीर सामाजिक और आर्थिक स्थिति के कारण उ.प्र. में फैले 600,000 से अधिक व्यापारी और डिस्ट्रीब्यूटर अपने वैध व्यवसाय में भारी नुकसान का सामना कर रहे हैं। ये व्यापारी और वितरक अपनी आजीविकाओं के लिए सिगरेटों की बिक्री और वितरण पर निर्भर है। उ.प्र. सरकार का निर्णय एक विपरीत फैसले की तरह सामने आया है और इससे उनकी आय पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है।

यह भी अनुमान लगाया गया है कि छोटे रिटेलरों के परिवारों के 30,000,000 सदस्य व्यवसाय में होने वाली निरंतर हानि के कारण गरीबी का सामना कर रहे है।। अधिकांश रिटेलर वैध सिगरेट व्यापार से होने वाली आय पर निर्भर हैं; उनके पास कोई वैकल्पिक व्यापार नहीं है और वे अंधकरामय भविष्य का सामना कर रहे हैं।

उ.प्र. में वैट विसंगतिः ग्लोबल अडल्ट टोबेको सर्वे (गैट्स) इंडिया 2010 रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेष में, विभिन्न तम्बाकू धूम्रपान उत्पादों का प्रयोग करने वाले वर्तमान धूम्रपानकर्ताओं मे से केवल 2.3 प्रतिशत व्यस्क सिगरेट पीने वाले हैं। राज्य में अधिकांश धूम्रपानकर्ता, लगभग 12.5 प्रतिशत बीड़ी पीने वाले हैं। विभिन्न तम्बाकू उत्पादों के वर्तमान उपयोक्ताओं में, 10.5 प्रतिशत व्यस्क गुटके का इस्तेमाल करते हैं जबकि 13.5 प्रतिशत व्यस्क उपयोक्ता खैनी का प्रयोग करते हैं।

कर विशेषज्ञों ने सिगरेटों पर वैट बढ़ाने के उ.प्र. सरकार के निर्णय पर सवाल उठाएं हैं जो व्यस्क धूम्रपानकर्ताओं का केवल 2.3 प्रतिशत हैं।

बीड़ी या खैनी पर वैट की दर नहीं बढ़ाई गई है जिसका उपयोग लगभग 25 प्रतिशत व्यस्क धूम्रपानकर्ता कर रहे हैं। सिगरेटों पर लगने वाले वैट की 50 प्रतिशत दर की तुलना में बीड़ी पर वैट की दर 13.5 प्रतिशत है। गुटके का मामला भी लगभग समान ही है, 10.5 प्रतिशत व्यस्कों द्वारा प्रयोग किए जाने वाले गुटके पर वैट की दर उ.प्र. में 13.5 प्रतिशत है।

सिगरेटों पर वैट में इस भारी वृद्धि से इनकी अंतर्राज्यीय स्मगलिंग में वृद्धि के कारण राज्य के खजाने में होने वाला लाभ अपर्याप्त है जैसा कि उ.प्र. के व्यापारियों के संगठनों ने जानकारी दी है। ये भारत के लिए खतरनाक संकेतक हैं और इन्हें न तो नज़रअंदाज किया जा सकता है और न ही खारिज किया जा सकता है।

राज्य सरकारो को अवैध सिगरेट उत्पादन और स्मगलिंग तथा इसके पीछे असमाजिक तथ्वों का हाथ होने के मुद्दे की जांच करने के लिए सलाह दी जा रही है।  यदि इस को नज़रअंदाज किया जाता है या इस पर ध्यान नहीं दिया जाता है तो ये असामाजिक तत्व अधिक ताकत हासिल कर लेंगे और राज्यों में व्यवसाय के वातावरण को नष्ट कर देंगे।

ऐसे सरकारी निर्णय अल्प और दीर्घकालिक रूप से उत्पादन विरोधी होते हैं, जबकि व्यवसाय माहौल में अपराधी एवं समाजविरोधी तत्वों को बढ़ावा मिलता है। ऐसे अवैध निर्माता कम लागत के उत्पादों का अवैध उत्पादन कर के और इन्हें बाजार में ला कर पूरी तरह उत्पाद शुल्क/वैट और अन्य कर बचा रहे हैं।

सबसे अधिक हानि स्वयं उपभोक्ता को हैः

चूंकि वैध सिगरेटों का मूल्य वैट बढ़ने क साथ बढ़ जाता है, इसलिए उपभोक्ता अवैध रूप से निर्मित सिगरेटों का विकल्प चुनता है जिनकी कीमत कम होती है और गुणवत्ता में यह और भी कम होती है। अवैध रूप से बनाई जाने वाली सिगरेटें वैध सिगरेट निर्माण दिशा निर्देशों का पालन नहीं करती हैं। अवैध तरीके से बनी सिगरेटों से धूम्रपान करने वालों के लिए अधिक जोखिम और खतरे होते हैं।

टोबेको एटलस - 3रे संस्करण के अनुसार, भारत की प्रति व्यक्ति सिगरेट खपत विश्व में सबसे कम 99 सिगरेट प्रति वर्ष है जबकि जापान में यह 2028, चीन में 1646, पाकिस्तान में 391 और बंगलादेश में 172 है।

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