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Wednesday, 02 January 2013 16:39

विश्वशांति की भारतीय विरासत

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(डा0 दिलीप अग्निहोत्री) पश्चिमी जगत के अनेक विद्वानों ने कहा था सविंधान नैतिक उपदेश के लिए नहीं होते। इसमें केवल शासन व्यवस्था को संचालित करने वाले नियमों का सचांलन होना चाहिए। शासन के तीनों अंगों के लिए बाध्यकारी होने चाहिए। सविंधान द्वारा निर्धारित सीमा रेखा में रहकर उन्हें अपने कर्तव्यों का निर्वाह करना चाहिए। दूसरी तरफ भारतीय संविधान इस विचार तक सीमित नहीं है। उसमें इस धारणा से आगे बढ़कर सोचा गया। इसमें शासन व्यवस्था को संचालित करने वाले प्रावधान है। वहीं विश्वशान्ति और मानव कल्याण की भावना भी समाहित है। यह धारणा अपने देश तक ही सीमित नहीं है। इसका ‘वसुघैव कुटुम्बकम’ की कामना से विस्तार किया गया। विश्व शान्ति का व्यापक सन्दर्भ है। यदि सभी देशों के बीच शान्ति-सौहार्द से पूर्ण संबंध होंगे, तो हथियारों की होड़ नहीं होगी। बहुत बड़ी धनराशि विनाश के इंतजाम में खर्च होती है। यह धनराशि विकास के कार्यो में लगाई जाए तो विश्व की तस्वीर बदल सकती है। तब गरीबी औैर भुखमरी को पूरी तरह मिटाना संभव हो सकेगा। तब सभी के स्वास्थ और शिक्षा की व्यवस्था हो सकेगी। जमीन में बारूदी सुरंगे नहीं बिछाई जायेगी। इस धनराशि से बड़े भूभाग में अन्न का उत्पादन हो सकता है। तब आंतकी नेटवर्क को चलाने के लिए भारी धनराशि खर्च नहीं होगी, तब निर्दोष लोगों की जीवन समाप्त करने के लिए बम विस्फोट का अपराध नहीं होगा। वरन् जाति-मजहब से ऊपर उठकर जरूरतमंदो की सहायता के लिए हाथ आगे बढ़ेगे। उनका जीवन बचाने का प्रयास होगा। किसी के आंसू पोछनें में खुशी का एहसास होगा। गीतकार नीरज की पंक्तियां उल्लेखनीय है- अब तो मजहब कोई ऐसा भी चलाया जाए। जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए। हो बगल में कोई भूखा तो हमसे भी ना खाया जाए। इसमें नए मजहब की बात वस्तुतः विश्व शान्ति की विरासत से प्रेरित है। यही विरासत भारतीय संविधान में दिखायी देती है। जिसमें शासन संचालन के कौरे सिद्धांतों का ही वर्णन नहीं है। वरन् भारतीय संविधान का समूचा नीति निर्देशक सिद्धांतों वाला अध्याय नैतिक मान्यताओं के रूप में समाहित है। ये उपदेश मात्र नहीं है।। वरन् आदर्श शासन के लिए मार्गदर्शक है। इस रूप में भारतीय संविधान बेमिसाल है। पहले आयरलैण्ड के संविधान में इस प्रकार के मार्गदर्शक थे। लेकिन पश्चिमी चिंतन के प्रभाव में वह लम्बे समय तक नहीं चल सके। विश्व शंति के लिए प्रयास करने की बातें विश्व के किसी संविधान में नहीं है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद इक्यावन में कहा गया कि- राज्य ऐसा प्रयास करेगा- अ- विश्व शंति और सुरक्षा को प्रोत्साहन मिले ब- विभिन्न देशों के बीच न्यायपूर्ण व सम्मान जनक संबंध कायम हो स- अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों के प्रति सम्मान हो द- अन्तर्राष्ट्रीय विवादों का वार्ता के द्वारा समाधान हो अनुच्छेद 38 लोककल्याण की स्थापना चाहता है। इस अनुच्छेद से जाहिर है कि भारतीय संविधान विश्व की शान्ति को कितना महत्व देता है। यही भारतीय विरासत है। जिसमें कुछ लोंगो या कुछ देशों कर भलाई की कामना नहीं की गई। सर्वे भवन्तु सुखिना, सर्वेशन्तु निरामयहः सर्वे भद्रणि पश्यति आधुनिक भारत में इन्ही विचारों को संवैधानिक मान्यता मिली। हम विश्व को अपने ढंग से चलाने को बाध्य नहीं कर सकते। सभी देश स्वंयभू है। लेकिन हम अपने स्तर से सन्देश दे सकते है। प्रयास कर सकते है। हम निःशस्त्रीकरण विवादों के शान्तिपूर्ण समाधान के लिए आपसी वार्ता को प्रोत्साहन दे सकते है। विश्व में शान्ति की स्थापना जटिल कार्य है। इसके लिए शासन के तीनों अंगो को प्रेरित करने की आवश्यकता है। विश्व के न्यायधीशों का अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन इसी दिशा में एक कदम है। न्यायधीश अपने विचारों की अभिव्यक्ति निर्णयों के माध्यम से करते है। यही न्यायिक निर्णय कई बार कानूनों के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करते है। न्यायिक निर्णयों पर सामान्य जन को विश्वास होता है। ऐसे में शन्ति- सौहार्द की दिशा में उनके विचार महत्वपूर्ण हो सकते है। मिड- डे मील जैसी योजना भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने दी विश्व के अधिकांश देशों में मनुष्यों के सामने अनेक समस्याएं है। भूख, गरीबी, अशिक्षा,अशन्ति से बड़ी आबादी पीडि़त है। इसके मुकाबले के लिए सम्मलित प्रयास होने चाहिए। इस दिशा में करीब साठ दंेशों के न्यायधीशों का एक मंच पर आना मील का पत्थर है। इसमें प्रशान्त महासागर के टुबालू नामक देश के राष्ट्रध्यक्ष गवर्नर जनरल इटालेली शामिल थे। वह अपने देश के भविष्य को लेकर परेशान है। गलोबल वार्मिंग से उनके समुद्र से घिरे देश का भविष्य दांव पर है। बिगड़ता पर्यावरण भी विश्व के सामने संकट है। सभी देश मिलकर इस संकट को दूर कर सकते है। अमेरिका के वर्जीनिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ग्लेन्ट ने विश्व का संविधान बनाया है। इसमें वीटों पावर समाप्त कर सभी देशों को प्रजातान्त्रिक ढंग से सहयोगी बनाने की बात की गई। लक्ष्य बड़ा है। दूर है। अभी लम्बी यात्रा करनी पड़ेगी। विश्व के विकसित देश पर्यावरण और निशस्त्रीकरण की दिशा में अपने कर्तव्यों का निर्वाह नहीं करना चाहते। वह वीटों पावर छोड़ने की बात दूर , सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने को तैयार नहीं है। सीएमएस लखनऊ में 7-10 दिसम्बर 2012 को आयोजित विश्व न्यायधीशों के अन्र्तराष्ट्रीय सेमिनार पर अधारित
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