Wed07172019

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आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर और आरटीआई कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर द्वारा इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ बेंच में बीसीसीआई के विरुद्ध दायर जनहित याचिका संख्या 3153/2012 में केन्द्र सरकार द्वारा अपने प्रतिशपथ पत्र यह बात स्वीकार की गयी है कि वे बीसीसीआई को लगातार नेशनल स्पोर्ट्स फेडरेशन बनने के लिए अनुरोध कर रहे हैं पर बीसीसीआई द्वारा इस पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है. खेल एवं युवा कार्यक्रम मंत्रालय द्वारा दायर प्रतिशपथ पत्र में यह कहा गया है कि वर्तमान में देश में 51 मान्यताप्राप्त नेशनल स्पोर्ट्स फेडरेशन हैं. इस सम्बन्ध में बीसीसीआई ने भी 05 फरवरी2011 को खेल मंत्रालय को नेशनल स्पोर्ट्स फेडरेशन की मान्यता दिये जाने हेतु अनुरोध किया था. लेकिन जब मंत्रालय द्वारा अप्रैल 2011 में बीसीसीआई को पत्र लिख कर उन्हें अपने पदधारकों के सम्बन्ध में सरकार द्वारा निर्धारित आयु और समयावधि सम्बंधित निर्देशों का पालन करने की सहमति देने की बात कही तो उसके बाद बीसीसीआई ने इस सम्बन्ध में चुप्पी साध ली. बीसीसीआई ने खिलाड़ियों के आयु सम्बंधित फ्रॉड और ड्रग निषेध के सम्बन्ध में लिए उपायों के बारे में भी खेल मंत्रालय को सूचित नहीं किया. इसी तरह उसने नेशनल टीम के चयन की प्रक्रिया एवं चयनकर्ताओं के सम्बन्ध में भी जानकारी नहीं दी. 
खेल मंत्रालय के प्रतिशपथ पत्र के अनुसार बीसीसीआई यद्यपि सीधा आर्थिक सहयोग नहीं लेता है पर उसे इनकम टैक्स
, कस्टम ड्यूटी आदि के माध्यम से सरकार करोड़ों का सहयोग देती है. इसी प्रकार कई राज्य सरकारों ने भी राज्य क्रिकेट एसोसियेशनों को कम दरों पर जमीन दिया है. इस प्रकार खेल मंत्रालय ने अमिताभ और नूतन की मांग की पूरी तरह पुष्टि की है कि बीसीसीआई को नेशनल स्पोर्ट्स फेडरेशन की मान्यता लेनी चाहिए. इन याचिकर्ता की यह प्रार्थना है कि या तो बीसीसीआई फेडरेशन की मान्यता ले और समस्त सरकारी नियमों का पालन करे अथवा केन्द्र सरकार बीसीसीआई के स्थान पर किसी अन्य इच्छुक संस्था को क्रिकेट का नेशनल स्पोर्ट्स फेडरेशन घोषित करे ताकि उस पर आवश्यक विधिक नियंत्रण रहे. मामले की अगली सुनवाई 20 सितम्बर 2011 को होगी.

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लखनऊ: सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर द्वारा इलाहाबाद हाई कोर्ट, लखनऊ बेंच में कोरपोरेट मामले मंत्रालय द्वारा अपने स्तर पर कराये गए एक अध्ययन के आधार पर कई बल्क तथा जेनेरिक दवाओं में भारी मुनाफा रोके जाने के लिए दायर जनहित याचिका संख्या 7596/2012 में आज चीफ जस्टिस अमिताव लाला एवं जस्टिस अनिल कुमार की बेंच के समक्ष कोरपोरेट मामले मंत्रालय एवं स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय को भी रिट याचिका में प्रतिवादी बनाए जाने के निर्देश दिये गए जिनका तत्काल अनुपालन किया गया.  मामले की अगली सुनवाई 17 सितम्बर को नियत की गयी. 

नूतन ठाकुर ने इस रिट याचिका में कहा है कि कोरपोरेट मामले मंत्रालय द्वारा कतिपय चोटी के बिकने वाले फार्मुलेशन एवं एम्लोडीपन, मेटफोर्मिन, सिप्रोफ्लोजेसिन तथा एजिथ्रोमाईसीन नामक चार चोटी के जेनेरिक दवाओं के सम्बन्ध में अध्ययन कराये जाने पर यह पाया गया कि तमाम बड़े दवा निर्माताओं द्वारा 203% से 1123%  तक मुनाफा लिया जा रहा है. इसमें रैनबैक्सी ग्लोबल, डॉ रेड्डी कैब, ग्लाक्सो स्मिथकिल्ने, फाईजर, सिप्ला, जाईडस जैसी बड़ी कंपनियां भी शामिल हैं. इस पर कोरपोरेट मामले के मंत्रालय ने 12 जून 2012 को रसायन एवं खाद मंत्रालय को इन दवाओं के विक्रय मूल्य पर आवश्यक प्रतिबन्ध लगाये जाने हेतु पत्र प्रेषित किया. ये सभी दवाएं नॉन-शेड्यूल दवाएं हैं जिनमे केन्द्र सरकार को ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर के अंतर्गत शेड्यूल दवाओं की तरह मूल्य निर्धारण का सीधा अधिकार नहीं है. लेकिन इस कंट्रोल ऑर्डर के ऑर्डर 5 तथा 10 में नॉन-शेड्यूल दवाओं के मूल्य पर उन स्थितियों में प्रतिबन्ध के लिए प्रावधान दिये गए हैं जब केन्द्र सरकार को यह महसूस हो कि इनके मूल्य बहुत अधिक निर्धारित किये गए हैं.

ठाकुर ने अपनी रिट याचिका में कहा है कि हज़ार प्रतिशत तक का मुनाफा पूर्णतया अनुचित है और इसके मद्देनज़र उच्च न्यायालय द्वारा केन्द्र सरकार की  नेशनल फार्मास्युटीकल प्राइसिंग ऑथोरिटी को इन दवाओं के मूल्यों पर आवश्यक प्रतिबन्ध लगाए जाने हेतु निर्देश देने की प्रार्थना की है.

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